Thursday, 10 May 2018

"मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता.."

कह कर यह जहाँ छोड़ गए शायर कैफ़ी आज़मी साहब को उनके स्मृतिदिन पर सलाम!

 
- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]


Wednesday, 9 May 2018

विशेष लेख:


मख़मली कोमल आवाज़ के..तलत महमूद!


- मनोज कुलकर्णी



"दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या हैं..
आखिर इस दर्द की दवां क्या हैं..?"
'मिर्ज़ा ग़ालिब' (१९५४) में "दिल-ए-नादाँ." पेश किया भारत भूषण और सुरैय्याने!
'मिर्ज़ा ग़ालिब' (१९५४) इस राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त फ़िल्म के लिए उनकीही रूमानी शायरी (सुरैय्या के साथ) गाकर मोहब्बत का दर्द बख़ूबी बयां किया था..तलत महमूद जी ने!..जब भी मैं यह सुनता हूँ प्यार भरा दिल उस शायराना माहौल में पहूँच जाता है!

आज तलत साहब का २० वा स्मृतिदिन! याद आ रहीं है लखनवी अदब के इस शानदार शख़्सियत से बहोत साल पहले उनके एक संगीत जलसे के दौरान हुई मेरी मुलाकात!
नौजवान गायक तलत महमूद.

शास्त्रीय संगीत का बाक़ायदा प्रशिक्षण लेकर महज १६ साल की उम्र में तलत ने दाग देहलवी, मिर, जिगर ऐसे मँजे हुए शायरों के कलाम 'ऑल इंडिया रेडिओ', लखनऊ पर गाना शुरू किया! उस कोमल रेशमी आवाज़ को पहचानते हुए 'एच.एम्.व्ही.' ने १९४१ में उसकी डिस्क बनायी!

उस्ताद बरक़त अली खां साहब और कुंदनलाल सैगल के उस दौर में..ग़ज़ल को अपनी पहचान बनाने तलत कलकत्ता आए। कुछ काल उन्होंने 'न्यू थिएटर' के संगीत क्षेत्र में काम भी किया! १९४४ के दरमियाँ उन्होंने वहां कमल दासगुप्ता के संगीत निर्देशन में गायी फ़ैयाज़ हाश्मी की "तसवीर तेरी दिल मेरा बेहेला न सकेगी.." ग़ज़ल मशहूर हो गयी! उसी दौरान उन्होंने कुछ बांग्ला गाने भी गाए और अच्छी सूरत होने के कारन परदे पर भी आए..इसमें 'राजलक्ष्मी' (१९४५) और 'तुम और मैं' (१९४७) इन फिल्मों में ख़ूबसूरत काननबाला के नायक भी बने!
गायक तलत महमूद और संगीतकार अनिल बिस्वास.


१९४९ में तलत बम्बई आए..तब संगीतकार अनिल बिस्वास ने उनके हुनर को परखा..और शाहीद लतीफ़ की फ़िल्म 'आरज़ू' के लिए "ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल.." यह मज़रूह सुल्तानपुरी का लिखा गाना उनसे गवाया.. जो मँजे हुए अदाकार दिलीपकुमार पर फ़िल्माया गया! अभिजात अभिनय और पार्श्वगायन का यह अनोखा संयोग दर्शकों को बहोत भाया! इसके सफलता के बाद १९५० का पूरा दशक जैसे तलत की मखमली आवाज़ से छाया रहा!..सज्जाद हुसैन, नौशाद, सी. रामचंद्र, मदनमोहन और सचिन देब बर्मन जैसे जानेमाने संगीतकारों ने उनसे गाने गवाएं!
वारीस' (१९५४) फ़िल्म के "राहीं मतवाले.." गाने में  
गायक-कलाकार तलत महमूद और सुरैय्या!


पार्श्वगायन के क्षेत्र में सफलता हासिल करते हुए तलत में अभिनेता बनने की ललक भी प्रबल थी और सैगल की तरह वह गायक-अभिनेता बनना चाहते थे! उनकी इस चाह से १९५३ में कारदार की 'दिल-ए-नादान' फ़िल्म में श्यामा के वह नायक बने..और बाद में एक सुरेला संगम रूपहले परदे पर आया फिल्म 'वारीस' (१९५४) से, जिसमे ख़ूबसूरत गायिका-अभिनेत्री सुरैय्या के वह नायक हुए..इसमें "राहीं मतवाले तू छेड़ एक बार मन का सितार.." इस रूमानी गाने में यह सुरेली साथ दर्शकों को भायी! बाद में वह बड़ी अभिनेत्रियों के भी नायक बने जैसे 'एक गांव की कहानी' (१९५७) में माला सिन्हा के! लेकिन साधारण रही इन फिल्मों के सिर्फ गाने लोकप्रिय हुए..मिसाल की तौर पर 'सोने की चिड़ियाँ' (१९५८) में नायिका नूतन ने उनके साथ ख़ूबसूरती से पेश किया "सच बता तू मुझ पे फ़िदा.."

'सोने की चिड़ियाँ' (१९५८) फ़िल्म के "सच बता तू मुझ पे फ़िदा.."
  गाने में गायक-अभिनेता तलत महमूद और नूतन! 


मख़मली आवाज़ के तलत सही मायने में आधुनिक सेमि-क्लासिकल और नॉन-क्लासिकल (फ़िल्मी) ग़ज़ल के निर्माता थे! यह सुने..एक तरफ हैं "मै दिल हूँ एक अरमाँ भरा.." ('अनहोनी'/१९५२), "शाम-ए-ग़म की कसम.." ('फुटपाथ'/१९५३), "जलते है जिसके लिए.." ('सुजाता'/१९५९) और "मै तेरी नज़र का सुरूर हूँ.." ('जहाँ आरा'/१९६४); तो दूसरी तरफ हैं "अंधे जहाँ के अंधे रास्तें.." (;पतिता'/१९५३), "बेचैन नज़र बेताब जिग़र.." ('यास्मिन'/१९५५), "अहा रिमझिम के ये प्यारे प्यारे गीत लिए.." ('उसने कहाँ था'/१९६०) और "इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा.." ('छाया'/१९६१).
श्रेष्ठ कलाकार..अभिनेता दिलीप कुमार और गायक-अभिनेता तलत महमूद!

संगीत के बदलते दौर में वाद्यों के आवाज़ तलत जी जैसे अभिजात गायकों की प्रतिभा पर हावी हो गए!..१९९२ में उन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया।..और १९९८ में वह जहाँ छोड़ कर चले गए!

तलत साहब ने गाया था..
"मेरी याद में तुम ना आसूँ बहाना.." 
लेकिन हम उन्हीं के गीत से कहते हैं..
"तेरा ख़याल दिल से मिटाया नहीं अभी."

उन्हे मेरी सुमनांजली!!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]
















Saturday, 5 May 2018

 
"शम्मा रह जाएगी...
परवाना चला जायेगा.."


मौसिकी के शहेनशाह नौशाद साहब का आज १२ वा स्मृतिदिन!


उनसे हुई मुलाक़ात की 'अनमोल घड़ी' याद आ रहीं हैं..!

उन्हें सलाम!!


- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी', पुणे]





< नौशाद साहब के संगीत में.. 
   गाते मोहम्मद रफ़ी साहब!

Friday, 4 May 2018


एक्सक्लूजिव्ह!


भारतीय सिनेमा के उन प्रवर्तकों को न भूलें!


- मनोज कुलकर्णी

दादासाहब फालके जी ने बनायी भारतीय फ़ीचर फ़िल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (१९१३) का महत्वपूर्ण दृश्य!

१०५ साल हो गए उस ऐतिहासिक घटना को..३ मई, १९१३ को दादासाहब फालके जी ने बनायी पहली भारतीय फ़ीचर फ़िल्म 'राजा हरिश्चंद्र' आम जनता के लिए बम्बई के 'कोरोनेशन सिनेमा' में प्रदर्शित हुई थी! लेकिन इससे पहले भी भारत में फ़िल्म बनाने की सफल-असफल कोशिशें हुई!
१८९४-९५ के दरमियाँन होनेवाला 'शाम्ब्रिक  खारोलिका '.. 'मैजिक लैंटर्न शो'! 

'शाम्ब्रिक खारोलिका '(मैजिक लैंटर्न'). 












सबसे पहले १८९४-९५ के दरमियाँन 'शाम्ब्रिक खारोलिका '(मैजिक लैंटर्न') नाम का इस सदृश चलचित्र का आभास दिलाने वाला खेल कल्याण के महादेव गोपाल पटवर्धन और उनके पुत्रो ने शुरू किया था।
हरिश्चन्द्र भाटवडेकर तथा सावे दादा!


फिर १८९६ में 'लुमीए शो' से प्रेरणा लेकर बम्बई में मूल रूप से छायाचित्रकार रहे हरिश्चन्द्र सखाराम भाटवडेकर तथा सावे दादा ने 'दी रेस्लर्स ' और 'मैन एंड मंकी ' जैसे लघुपट १८९९ में बनाएं। किसी भारतीय ने चित्रपट निर्मिती करने का वह पहला प्रयास था!
'रॉयल बॉयोस्कोप' के हीरालाल सेन और उन्होंने बनायी डॉक्यूमेंटरी 'स्वदेशी मूवमेंट'!


इसके बाद कोलकत्ता में 'रॉयल बॉयोस्कोप' के हीरालाल सेन और उनके बन्धुओने कुछ बंगाली नाटक और नृत्य के दृश्य चित्रित करके फ़रवरी, १९०१ के दरमियाँन वह परदे पर दिखाएं! 


आगे १९०५ तक कोलकत्ता में जे. एफ. मदान इन्होने इस तरहकी चित्रनिर्मिती शुरू की! नाटयसृष्टी से आए हुए मदान ने 'ग्रेट बंगाल पार्टीशन मूवमेंट' जैसे लघुपट निर्माण किएं। इन्हे वो 'स्वदेशी ' कहा करते थे!

जे. एफ. मदान.
इसके बाद ऐसा प्रयास करने वाली व्यक्ति थी श्रीनाथ पाटनकर..उन्होंने १९१२ में 'सावित्री' यह कथा चित्रपट किया तो था...लेकिन उसके निर्मिती प्रक्रिया (प्रोसेसिंग) में समस्याए पैदा हुई और उसकी प्रिंट पूरी तरह से ब्लेंक आ गयी!

१९१२ में ही रामचन्द्र गोपाल तथा दादासाहेब तोरने...इन्होने 'पुंडलिक' यह अपना कथा चित्रपट सफलतासे पूरा किया!...लेकिन वह भारत का पहला कथा चित्रपट नहीं माना गया। इसकी वजहें नमूद की गयी की..वह नाटक का चित्रीकरण था, उसके लिए विदेसी छायाचित्रकार का सहयोग लिया गया..और इसकी प्रक्रिया लन्दन में करायी गयी!..हालांकि इसकी प्रिंट भी उपलब्ध नहीं!
दादासाहेब तोरने और १९१२ में प्रदर्शित उनकी फिल्म 'पुंडलिक' की जाहिरात!

इसी दौरान नाशिक के दादासाहब फालके ने फ़िल्म निर्माण का जैसे ध्यास लिया, जिसे उनकी पत्नि ने भी सक्रिय साथ दिया!..और 'बीज से उगता पौदा' इस लघुपट से शुरू करके १९१३ में 'राजा हरिश्चन्द्र' यह भारत का पहला कथा चित्रपट तैयार करने तक उन्होंने बडा यश संपादन किया! इसका अब बड़ी फिल्म इंडस्ट्री के रूप में वृक्ष हुआ हैं!
पत्नि सरस्वतीबाई के साथ उम्र के आखरी पड़ाव में दादासाहब फालके!
लेकिन मेरा कहना है की भारत में छोटी फिल्म से यह मीडियम लाने का काम (भाटवडेकर) सावे दादा जी ने पहले किया...फिर हीरालाल सेन और मदान इन्होनें कुछ लघुपट (नॉन फ़ीचर कह सकते हैं) बनाकर इसमें अपना योगदान दिया!.और दादासाहब फालके ने पहला कथा चित्रपट (फ़ीचर फ़िल्म) तैय्यार किया!..तो इन सब हस्तियों को भारतीय सिनेमा के जनक में शामिल करना चाहिएं!



भारतीय सिनेमा के इन प्रवर्तकों को मानवंदना!!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]

Monday, 30 April 2018

आज़ हमारे 'भारतीय सिनेमा के पितामह' दादासाहब फालके जी का जनमदिन!

उन्होंने १९१३ में 'राजा हरिश्चन्द्र' यह पहली भारतीय फिचर फिल्म बनायी! जिसे अब १०५ साल हो गएं है!
 

उन्हें  सलाम!!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]

Sunday, 22 April 2018

भारतीय सिनेमा की मासूम ख़ूबसूरती..उषा किरण!


- मनोज कुलकर्णी

फ़िल्म 'दाग' (१९५२) में मासूम ख़ूबसूरत उषा किरण की रूमानी अदा!

फ़िल्म 'पतिता' (१९५३) के "याद किया दिलने .. " गाने में उषा किरण और देव आनंद!


"याद किया दिलने 
कहाँ हो तुम.."


'पतिता' इस साठ साल पहले बनी अमिया चक्रवर्ती की क्लासिक फिल्म का यह गाना जब सुनते हैं तब..देव आनंद के साथ वह परदे पर तरल रूमानी भाव से साकार करने वाली मराठी तारका याद आती है.. उषा किरण!



भारतीय सिनेमा के सुनहरे काल में हिंदी और मराठी फिल्मों के परदे पर एकही वक़्त छा जानेवाली..मासूम चेहरे की खूबसूरत अदाकारा थी उषा किरण!..आज उनका जनमदिन!
हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'मुसाफीर' (१९५७) में उषा किरण और दिलीपकुमार!

मराठी रंगभूमीपर 'आशीर्वाद' जैसे नाटकों से अभिनय की शुरुआत करनेवाली उषा किरण ने १९४८ में प. उदयशंकर की परदे पर आयी क्लासिक नृत्य-नाटिका 'कल्पना' से हिंदी सिनेमा में प्रवेश किया! उसके बाद 'बादबान' (१९५४) जैसी दर्जेदार फिल्मों में उन्होंने बखूबी भूमिकाएं अदा की..जिसके लिए उन्हें सम्मान भी प्राप्त हुए. इसके साथ उल्लेखनीय की अभिनयसम्राट दिलीपकुमार ('दाग'/१९५२) और देव आनंद ('पतिता'/१९५३), राज कपूर ('नज़राना'/१९६१) जैसे मशहूर अभिनेताओं के सामने उन्होंने अपना अभिनय दर्शाया!
माधव शिंदे की मराठी फिल्म 'शिकलेली बायको' (१९५९) में उषा किरण!

मराठी में दत्ता धर्माधिकारी की 'स्त्री जन्मा ही तुझी कहाणी' (१९५२), राम गबाले की 'पोस्टातील मुलगी' (१९५४) और माधव शिंदे की 'शिकलेली बायको' (१९५९), 'कन्यादान' (१९६०) जैसी फिल्मों में उन्होंने समाज में स्त्री का स्थान दर्शानेवाली तथा प्रागतिक विचारोंकी भूमिकांए स्वाभाविकता से साकार की. इसमें सूर्यकांत जैसे जानेमाने अभिनेता उनके साथ थे!

१९७० के बाद उन्होंने चरित्र भूमिकाएं करना शुरू किया! उनकी बेटी तन्वीजी (आज़मी) भी हिंदी सिनेमा में अपना अच्छा अभिनय दर्शाती आयी हैं..और अब हाल ही में उनकी पोती सैयामी खेर ने भी 'मिर्ज़ियाँ' फ़िल्म से परदे पर कदम रखा हैं!

मराठी फिल्म 'कन्यादान' (१९६०) में सूर्यकांत के साथ उषा किरण!
उषा किरणजी से मेरी मुलाक़ात १९९५ में जब सिनेमा का शताब्दी समारोह बम्बई में संपन्न हुआ तब हुई थी..वह आखरी रही! तब उनसे भावुकता से हुई बात और 'उस जमानें में पिताजी जैसे उनके प्रशंसक थे' इसका मैंने किया ज़िक्र अब भी याद हैं!

उन्हें जनमदिन पर अभिवादन!!

- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी, पुणे]

Thursday, 19 April 2018

आम लोगों का मनोरंजन..सिनेमा उनसे दूर!


- मनोज कुलकर्णी

बॉलीवुड की सबसे अधिक साल सिंगल स्क्रीन में चली १९९५ की 
शाहरुख़ खान और काजोल की 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे'!

प्रकाश मेहरा की हिट फिल्म 'मुकद्दर का सिकंदर' (१९७८) में 
अमिताभ बच्चन, रेखा और अमजद खान!
समानांतर सृष्टी की अनुभूति देनेवाला और उसमें अपना जी चाहा जीवन, प्यार और सुख-दुख महसूस करनेवाला..आम लोगों का एकमात्र प्रिय मनोरंजन था (और है) सिनेमा! लेकिन सिंगल स्क्रीन से..महेंगा हो कर मल्टीप्लेक्स के हाई-फाई कल्चर में आया उनका प्यारा सिनेमा..जैसे उनसे दूर चला गया!

वह जमाना था जब अपने चहेते कलाकार, निर्देशक की या कोई पसंदीदा फ़िल्म रिलीज़ होती थी तो साथियों के साथ उसका लुत्फ़ उठाने चल पड़ते थे दीवाने! इसमें हम बचपन में अमिताभ बच्चन की फिल्म रिलीज़ होते ही जाते थे.. अन्याय करनेवालों का बेड़ा गर्क करनेवाले इस एंग्री यंग मैन का संघर्ष महसूस करने! सीटियाँ तो खूब पड़ती थी तब थिएटर में!

 नासिर हुसैन की रोमैंटिक म्यूजिकल्स 'दिल देके देखो' (१९५९) में आशा पारेख और शम्मी कपूर!
फिर बड़े होने पर कॉलेज के ज़माने में मैटिनी को फ़िल्मकार नासिर हुसैनकी रोमैंटिक म्यूजिकल्स कॉलेज बंक करके देखते थे और उसमें दिखाई देने वाले रूमानी पलों में खुद को देखतें बड़े रोमैंटिक हो कर बाहर निकलते थे! तब ही फिल्मों पर लिखना मैने शुरू किया; इस लिए मैं बाद में क्लासिक से सोशल हर तरह की फ़िल्में गंभीरता से देखने लगा!
शक्ति सामंता की रोमैंटिक फिल्म 'आराधना' (१९६९) में शर्मिला टैगोर और राजेश खन्ना!

मुझे याद है ढाई या पाँच रुपये से शुरू हुआ करती थी सिंगल स्क्रीन की टिकिटे तब..और काम से थके भागे लोग अपना दिल बहलाने (या कभी जी न पानेवाले) सपनों का सफर देखने-महसूस करने आ कर बैठ जाते थे इसमें! उच-नीच, मजहब-जात ऐसा कोई भेद वहां था ही नहीं..सब एक साथ अपने प्यारे सिनेमा की दुनियाँ में खुशी से खो जाते थे! भूल जाते थे अपनी नीजी दुखी जिंदगी!

समानांतर सिनेमा का दौर शुरू करनेवाली श्याम बेनेगल की 
फिल्म 'अंकूर' (१९७४) में शबाना आज़मी और अनंत नाग!

देखते देखते सिनेमा में काफ़ी तकनिकी बदलाव आया..सिनेमास्कोप, ७० एम.एम. से डॉल्बी साऊंड और ३ डी तक देखने-सुनने के कई आधुनिक रूप इसको मिले! मुख्य प्रवाह और कला सिनेमा ऐसे दो वर्ग में वह बटा और बाद में समानांतर सिनेमा का 'अंकूर' भी उगा! 

विश्व सिनेमा की शताब्दी समारोह पर बम्बई में १९९५ में हुए 
'सिनेमा सिनेमा' कार्यक्रम के पूर्व इसके सादरकर्ते शोमैन 
फ़िल्मकार सुभाष घई के साथ मै बात करता हुआ!


नेशनल अवार्ड्स के साथ अपने इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स ने भी सिनेमा की क्वालिटी को परखना और दिखाना शुरू किया था..तो ऐसे सिनेमा को फिल्म सोसाइटी जैसे उपक्रमों के ज़रिए देखने लगे क्लास औडिएंस! फिर 'फिल्म अप्रेसिअशन' (एफ.ए.) कोर्स की जरुरत महसूस हुई..और पहले से गंभीरता से सिनेमा पर लिखते आ रहा मैने भी मेरे कम्युनिकेशन-जर्नालिज्म कोर्स (बी.सी.जे) के बाद वह 'एफ.ए.' कोर्स फ़िल्म इंस्टिट्यूट में किया!..बाद में अपने इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स ('इफ्फी') को जाकर बहोत अच्छा वर्ल्ड सिनेमा देखता रहा!
श्रीलंकन श्रेष्ठ फ़िल्मकार लेस्टर जेम्स पेरिस और मिसेस सुमित्रा पेरिस के साथ 
दिल्ली के 'सीरी फोर्ट' में २००० में हुए 'इफ्फी' में मैं!


फिर परिस्थिती ऐसी आयी की ज्यादा तर अच्छा और पारितोषिक प्राप्त सिनेमा सिर्फ फिल्म फेस्टिवल्स तक ही सीमित रहा! ऐसा सिनेमा देखनेवाला एक एलीट क्लास औडिएंस तैयार हुआ..जो सिंगल स्क्रीन के आम माहौल में जाना इतना पसंद नहीं करता था! तो सिनेमा के साथ उसके दिखाने की जगह में भी परिवर्तन आने की जरुरत पड़ी! 

विकसित हुआ शॉपिंग मॉल कल्चर..शुरुआत मल्टीप्लेक्स थिएटर की!
ऐसे वक़्त एक तरफ मॉल कल्चर भी यहाँ विकसित हो रहा था..जिसमें सभी चीजें एक ही बड़ी इमारत में मिलने की सुविधा हाई सोसाइटी को मिली..बाद में वह आम हो चला! तो इसी कल्चर के मद्देनज़र सामने आयी मल्टीप्लेक्स थिएटर की कल्पना..जिसमें तीन से छह-सात तक स्क्रीन्स समाविष्ट हुए। बहोत साल पहले हम जब दिल्ली में 'इफ्फी' देखतें थे..तब सिर्फ वहीँ 'सीरी फोर्ट' में ऐसे एक जगह चार-पाँच स्क्रीन्स हुआ करते थे!
मल्टीप्लेक्स थिएटर्स का महेंगा..रॉयल सिटींग अन्दाज़!
हालांकि मल्टीप्लेक्स थिएटर का नजरियाँ पूरा कमर्शियल था..इसलिए इसमें सिनेमा देखने आएं लोगों के लिए रेस्टौरंट्स और शॉपिंग शॉप्स भी खुलें! यहाँ सिनेमा देखने जानेवालों को अलग अलग फिल्मों के पर्याय उपलब्ध हुए..लेकिन एक बड़ी फ़िल्म एन्जॉयमेंट कन्सेप्ट विकसित हुई..जो आम लोगों के बस में नहीं रहीं! इसमें उनके हाई टिकेट्स रेट्स जो सौ से चारसों तक गएँ और साथ में महेंगे दामों में कुछ खाना-पीना..जो उनके लिए जैसे एक फाइव स्टार हो गया! 

इससे पहले परिवार के साथ इतवार या छुट्टी के दिन पिक्चर देखने का प्रोग्राम करनेवाले आम लोगों को यह जैसे उनकी आधी तनख़्वाह खर्च करना था..जो वह कतई कर नहीं सकतें थे! तब तक टीवी पर मूवी चैनल्स की संख्या भी बढ़ गयी थी..तो मिड्लक्लास भी केबल लेकर घर में ही सबके साथ कोई फिल्म देखने के पर्याय पर आया! लेकिन सिनेमा थिएटर में ही बड़े परदे पर अद्ययावत तांत्रिक सुविधाओं में देखकर अनुभव कर सकतें हैं!
हाल ही में आयी एस. एस. राजामौली की बड़ी लोकप्रिय फिल्म 'बाहुबली' 
और प्रभास के साहस दृश्य सिर्फ बड़े परदे पर ही एन्जॉय कर सकते हैं!


अब मासेस का यह एंटरटेनमेंट इतना महेंगा होने की (मल्टीप्लेक्स थिएटर के साथ) और भी वजहें हैं..जिसमें प्रमुख हैं फिल्मों के बढे प्रोडक्शन कॉस्ट्स..कुछ लाखों में बनती फिल्में कई करोड़ों लेनी लगी! इसके साथ कलाकार और उसमें भी लोगों के चहेते सुपरस्टार्स के दाम चोटी पर पहुँच गए! इन सब बातों का असर सिनेमा प्रदर्शन पर पड़ा और टिकिट्स महेंगे हुए! फिर मल्टीप्लेक्स में ऊचें दामों में सिनेमा देखना यह आम लोगों के बस में नहीं रहां!
बॉलीवुड के महंगे सुपरस्टार्स सलमान खान और कैटरिना कैफ़ नयी फ़िल्म 'टाईगर ज़िंदा है' में!

अब हाल ही में इस विषय पर फिर से चर्चा शुरू हुई तो यह लिखा! कुछ साल पहले 'फिक्की' के बम्बई में हुए 'फ्रेम्स' कन्वेंशन मे एक चर्चा में भी यह बात मैने उठाई थी! 

अब सिनेमा निर्मातां, निर्देशक, कलाकार, तन्त्रज्ञ और वितरक, प्रदर्शक तथा मल्टीप्लेक्स थिएटर्सवालों ने मिल कर इसका कुछ हल निकालना चाहीए..और मासेस के बस में सिनेमा का मनोरंजन लाना चाहीए!

इस लिए सबको शुभकामनाएं!!

- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी', पुणे]

Tuesday, 17 April 2018

'राजकमल' की फिल्म 'दहेज़' (१९५०) का पोस्टर!

'दहेज़' चित्र समकालिन! 

- मनोज कुलकर्णी


दहेज़ की समस्या अब भी कितनी भयंकर है इसका अहसास समाचारों के जरिये हमेशा होता आ रहा है! इसके मद्देनजर मुझे पुरानी सामाजिक फिल्म 'दहेज़' (१९५०) और उसका हृदयद्रावक प्रसंग याद आया!

'दहेज़' (१९५०) के फ़िल्मकार व्ही. शांतारामजी!
जानेमाने फ़िल्मकार व्ही. शांताराम ने बनायी इस फिल्म का लेखन शम्स लखनवीजी ने किया था! इसमें श्रेष्ठ कलाकार पृथ्वीराज कपूर पिता और जयश्री बेटी ऐसे किरदार में थे! (साथ में करन दीवान और ललिता पवार भी थे!)
  
उनके बीच फिल्म के क्लाइमैक्स में हुआ संवाद इस तरह था..
'दहेज़' (१९५०) में जयश्री, करन दीवान, पृथ्वीराज कपूर और ललिता पवार!
बेटी कहती है "पिताजी, आपने दहेज़ में सबकुछ दे दिया; लेकिन एक चीज देना भूल गए!"
 

तब पिता पुँछते है "वह कौनसी?"

उसपर बेटी कहती है "कफ़न!"

पृथ्वीराजसाहब और जयश्रीजी ने यह प्रसंग ऐसे स्वाभाविकता से साकार किया था कि वह हालात असल में जी रहें है!..यह देख कर आँखे नम हो गयी थी!!

- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी, पुणे]

Sunday, 8 April 2018

फिर उभरे ऐसे हालातों के मद्देनज़र बॉलीवुड की हिट फ़िल्मोंके यह मशहूर गाने याद आए!





 -: बाये

'गुमनाम' (१९६५) में हेलन से मेहमूद कहेता हैं "हम काले है तो क्या हुआ दिलवाले हैं.."  

और.. 


 
दाये: -

'रोटी' (१९७४) में मुमताज़ को राजेश खन्ना (!) कहेता हैं "गोरे रंग पे न इतना गुमान कर.."



- मनोज कुलकर्णी 
 ['चित्रसृष्टी', पुणे]

Friday, 6 April 2018

ख़ूबसूरत अभिनेत्री सुचित्रा सेन!


"रहें ना रहें हम..महेका करेंगे..
बनके कली..बनके सबा..
बाग-ए-वफ़ा में...!"


बिमल रॉय की अभिजात 'देवदास' (१९५५) में सुचित्रा सेन और दिलीपकुमार!
हमारे भारतीय सिनेमा की बेहतरीन अभिनेत्री..'पद्मश्री' प्राप्त सुचित्रा सेनजी का आज ८७ वा जनमदिन!

 मूल बंगाली सिनेमा से आयी यह खूबसूरत अदाकारा ने वहां 'सप्तपदी' (१९६१) और 'सात पाके बंधा' (१९६३) जैसी आंतरराष्ट्रीय कीर्ति प्राप्त चित्रकृति में काम किया!
सुचित्रा सेन ने फ़िल्म 'ममता' (१९६६) में दोहरी भूमिकाएं बख़ूबी अदा की!

इसके साथ अभिजात 'देवदास' (१९५५) और 'आंधी' (१९७५) जैसी फिल्में करके हिंदी सिनेमा के परदे पर भी वह अपनी छबि छोड़ गयी!



उन्होंने दोहरी भूमिकाएं बख़ूबी अदा किए फ़िल्म 'ममता' (१९६६) के उपर के गाने से उन्हें याद  किया है!!


उन्हें मेरी सुमनांजली!!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]

Saturday, 31 March 2018

 
"राह देखा करेगा सदियों तक..
छोड़ जाएँगे यह जहाँ तनहाँ.."


शायरा और मशहूर अदाकारा महजबीं बानो..याने की भारतीय सिनेमा की ट्रैजडी क्वीन..
'पाक़ीज़ा' मीना कुमारी जी ने यह लिखा था..इस जहाँ को छोड़ते वक़्त..जो हम महसूस कर रहें हैं!

उनको स्मृतिदिन पर मेरी सुमनांजली!!

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]

Friday, 30 March 2018

" ये जीवन है...
इस जीवन का यही है रंगरूप
थोड़े ग़म हैं..थोड़ी खुशियाँ.."


कवि एवं गीतकार आनंद बख़्शी जी को उनके स्मृतिदिन पर सुमनांजली!

 
- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]

Tuesday, 27 March 2018

उर्दू कवी आगा हश्र कश्मीरी.

आगा हश्र कश्मीरी..उर्दू के शेक्सपीअर!


- मनोज कुलकर्णी

 
"सब कुछ खुदा से माँग लिया तुझको माँगकर
उठते नहीं हैं हाथ मेरे..इस दुआ के बाद..!"


आगा हश्र कश्मीरीजी का यह शेर..सुना-देखा 'संगम' (१९६४) फिल्म के एक सीन में..जिसमें राज कपूर वैजयंतीमाला को यह कहते है!
फिल्म 'संगम' (१९६४)  में वैजयंतीमाला और राज कपूर!

उर्दू के विख्यात कवी तथा नाटककार कश्मीरीजी को आज 'विश्व रंगमंच दिन' पर याद करना लाज़मी है..क्योंकि उन्हें 'उर्दू के शेक्सपीअर' कहा जाता था!

 
१८९७ में उनका 'आफ़ताब-ए-मोहब्बत' यह पहला नाटक प्रसिद्ध हुआ! उन्होंने ड्रामा राइटर की हैसियत से बम्बई के 'न्यू अल्फ्रेड थिएटर कंपनी' के लिए काम किया..जहाँ 'मुरिद-ए-शाक' यह उनका पहला प्ले किया गया, जो बहुत सफल हुआ..यह शेक्सपीअर के 'द विंटर्स टेल' से रूपांतरित था! बाद में उन्होंने शेक्सपीअर के कई प्लेज़ उर्दू में रूपांतरित किए!

बिमल रॉय की फिल्म 'यहूदी' (१९५८) में मीना कुमारी और दिलीपकुमार!
१९१५ में प्रकाशित उनका 'यहूदी की लड़की' नाटक तो बहुत मशहूर हुआ..और बाद में उस पर फिल्में भी बनी! इसमें प्रख्यात 'न्यू थिअटर्स' ने सैगल, रतनबाई और पहाड़ी सन्याल को लेकर १९३३ में 'यहूदी की लड़की' फिल्म की..तो बाद में दिलीपकुमार, मीना कुमारी और सोहराब मोदी को लेकर बिमल रॉयजी ने १९५८ में 'यहूदी' फिल्म निर्देशित की..जो काफ़ी सराही गयी!

पारसी थिएटर पर उनके काफ़ी नाटक सादर हुए! करिअर के आखरी पड़ाव में कश्मीरीजी ने 'शेक्सपीअर थिएट्रिकल कंपनी' स्थापित की; लेकिन वह थोड़ेही काल चली!

उन्हें अभिवादन!!

- मनोज कुलकर्णी
 ['चित्रसृष्टी', पुणे]

Monday, 26 March 2018

विशेष लेख:

फ़ारूख़ शेख़ ..शानदार शख़्सियत!

- मनोज कुलकर्णी


भारतीय समानांतर सिनेमा के संवेदनशील तथा शानदार अभिनेता..फ़ारूक़ शेख़!


"फिर छिड़ी रात..बात फूलों की.." 'बाज़ार' (१९८२) में सुप्रिया पाठक और फ़ारूख़ शेख़!
"फिर छिड़ी रात..
  बात फूलों की.."

मख़दूम मोइनुद्दीनजी की ग़ज़ल 'बाज़ार' (१९८२) इस साग़र सरहदी की फिल्म में सुप्रिया पाठक के साथ उतनी ही रूमानी तरीक़े से साकार की थी फ़ारूख़ शेख़ ने!

भारतीय समानांतर सिनेमा के संवेदनशील तथा शानदार अभिनेता फ़ारूक़ शेख़ जी आज होते तो उनकी ७० वी सालगिरह मनायी जाती थी!
"सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ हैं."..'गमन' (१९७८) में फ़ारूख़ शेख़.


कॉलेज के दिनों से ही 'इप्टा' के जरिए थिएटर से जुड़े रहे फ़ारूख़ शेख़ को जानेमाने निर्देशक एम्. एस. सैथ्यु ने १९७३ में अपनी पहली फ़िल्म 'गरम हवा' के लिए चुना! पार्टीशन की पृष्ठभूमी पर बनी यह महत्वपूर्ण फ़िल्म बाद में मानदंड साबित हुई। यहीं से फ़ारूख़ जी का कला तथा समानांतर फिल्मों का सफर शुरू हुआ..!

रोमैंटिक म्यूजिकल 'नूरी' (१९७९) में फ़ारूख़ शेख़. और पूनम ढ़िल्लो!
१९७७ में विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजित राय ने उनकी उर्दू में बनी 'शतरंज के खिलाड़ी' इस फ़िल्म में फ़ारूख़ जी को लिया। बाद में मुज़फ्फर अली की 'गमन' (१९७८) में गांव से काम के लिए महानगर आए आदमी की संघर्षपूर्ण व्यक्तिरेखा उन्होने साकार की! फिर मुज़फ्फर जी की 'उमराव जान' (१९८१) में भी उन्होंने (रेखा के साथ) लख़नवी नवाब का क़िरदार उसी शान-ओ-शौक़त से पेश किया!
'चश्मे बद्दूर' (१९८१) में फ़ारूख़ शेख़, रवि बासवानी और राकेश बेदी!
मुख्य धारा की सिनेमा में फ़ारूख़ जी का प्रवेश हुआ यश चोपड़ा की रोमैंटिक म्यूजिकल 'नूरी' (१९७९) फ़िल्म से..जिसमें ख़ूबसूरत पूनम ढ़िल्लों उनके साथ थी। इसमें जान निसार अख़्तर जी के "आ जा रे मेरे दिलबर आजा.."जैसे गानों को ख़ैय्याम जी ने संगीतबद्ध किया और पहली बार नितिन मुकेश ने गाया था! यह फ़िल्म बड़ी क़ामयाब रहीं। इसके बाद सई परांजपे की रोमैंटिक कोमेडी फिल्म 'चश्मे बद्दूर' (१९८१) में उन्होने लाजवाब काम किया..नौजवानों की इस फिल्म में राकेश बेदी और रवि बासवानी उनके साथ थे। यह फ़िल्म ज्युबिली हिट हुई! फिर 'कथा' (१९८३) इस सई जी की फिल्म में भी वह बहारदार भूमिका में नज़र आए।
परदे पर जमीं जोड़ी!..'साथ साथ (१९८२) में दीप्ति नवल और फ़ारूख़ शेख़!

'चश्मे बद्दूर' की "मिस चमको" नाम से जानी गयी मध्यम वर्ग की लड़की साकार करनेवाली दीप्ति नवल से फ़ारूख़जी की परदे पर जोड़ी ख़ूब जमीं.. जिसके जरिए उन्होंने आम जीवन को स्वाभाविकता से दर्शाया। हालांकि जमीनदार परिवार के होने से उनका दिखना रॉयल था; फिर भी रमन कुमार की 'साथ साथ (१९८२) जैसी फ़िल्म में "ये तेरा घर..ये मेरा घर.." ऐसा आम लोगों का सीमित सपना वह गुनगुनातें रहें! फिर हृषिकेश मुख़र्जी की 'किसी से ना केहना' और 'रंग बिरंगी' (१९८३) जैसीं रोमैंटिक कोमेडी फिल्मों में उन्होंने अच्छे रंग भरें!..आखरी बार फ़िल्म 'लिसन अमया' (२०१३) में यह बुज़ुर्ग कलाकार साथ आए!
टीवी धारावाहीक 'श्रीकांता' में मृणाल कुलकर्णी और फ़ारूख़ शेख़!


इसी दौरान शबाना आज़मी के साथ भी फ़ारूख़जी ने पारीवारिक 'लोरी' (१९८४) और सामाजिक 'एक पल', 'अंजुमन' (१९८६) जैसी समस्याप्रधान फ़िल्में की! आगे 'तुम्हारी अमृता' इस नाटक में भी दोनों ने साथ में बेहतरीन काम किया!

दरमियान फ़ारूख़जी ने टेलीविज़न पर भी कुछ महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभायी जैसे की प्रख्यात बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की उपन्यास पर बनी 'श्रीकांत' (१९८५ से १९८६) और स्वतंत्रता सेनानी हसरत मोहानी पर हुई 'कहक़शाँ' (१९८८). इसके साथ ही राजकीय उपहास पर उल्लेखनीय 'जी मंत्रीजी'! बाद में 'जीना इसी का नाम है' कार्यक्रम का सूत्रसंचालन भी उन्होंने बख़ूबी किया।
फ़िल्म 'लाहौर' (२००९) में फ़ारूख़ शेख़!


बाद में कुछ ऑफ बीट फिल्मों में फ़ारूख़जी ने काम किया जैसे की 'मादाम बोवारी' इस ग्यूस्टाव फ्लाउबर्ट की अभिजात फ्रेंच नॉवेल पर केतन मेहता ने बनायी हिंदी फिल्म 'माया मेमसाब' (१९९३) में उन्होंने दीपा साही के साथ डॉक्टर की भूमिका निभाई! तो शोना उर्वशी ने बनायी 'सास बहु और सेंसेक्स' (२००८) इस आधुनिक मुंबई के जीवन पर सिनेमैटिक कमेंट करने वाली फ़िल्म में भी अलग किरदार निभाया!
आखरी फिल्म 'क्लब ६०' (२०१३) में फ़ारूख़ शेख़ और सारीका!

इसके बाद 'लाहौर' (२००९) इस फ़िल्म में भी उनका महत्वपूर्ण क़िरदार था..जिसके लिए उन्हें 'सर्वोत्कृष्ट सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय सम्मान मिला!..और 'क्लब ६०' (२०१३) यह सिनियर सिटीज़न के भावविश्व पर बनी उनकी आखरी फिल्म रहीं!
दीप्ति नवल और फ़ारूख़ शेख़ आखरी बार साथ..'लिसन अमया' (२०१३). 

२०१३ में उनकी 'लिसन अमया' यह फ़िल्म 'इफ्फी', गोवा में नवम्बर में मैंने देखी..और दिसम्बर में वह दिल का दौरा पडने से गुज़र जाने की ख़बर आयी!..लगा जैसे 'गमन' में उनपर फ़िल्मायी गयी ग़ज़ल वह वाक़ई महसूस कर रहें थे..

"सीने में जलन..आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ हैं.."

- मनोज कुलकर्णी
['चित्रसृष्टी', पुणे]